हिंगलाज माता मन्दिर पाकिस्तान

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हिंगलाज माता मन्दिर
हिंगलाज माता मन्दिर

हिंगलाज माता मन्दिर पाकिस्तान

पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य की लारी तहसील के पहाड़ी इलाके में एक संकीर्ण घाटी में स्थित है।
यह कराची के उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर अरब सागर से 19 किलोमीटर यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ियों की एक शृंखला के अंन्त में चंद्रकूप पहाड़ पर स्थित माता सती के 51 शक्तिपीठ में से एक है।
यह क्षेत्र हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के अन्तर्गत आता है।
यहाँ माँ हिंगलाज देवी या हिंगुला देवी भी कहते हैं।
इस मन्दिर को नानी मन्दिर के नामों से भी जाना जाता।

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Hinglaj
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पौराणिक कथा

पौराणिक कथानुसार जब माता सती अपने पिता दक्ष प्रजापति के घर बिना बुलाई गईं थीं। और वहाँ अपना देखते हुए माता सती ने दक्ष के हवन कुंड में आत्मदाह कर लिया था।
तब क्रोधित होकर भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर बैरागी रूप में तांडव नृत्य कर रहे तब ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिये।भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया।
मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का सिर गिरा था।
इसलिये हिंदुओं के लिए यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण एवं पूजनीय है।
51 शक्तिपीठ में से एक माता हिंगलाज देवी मंदिर।

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नानी पीर

जब भारत का बटवारा नहीं हुआ था और भारत की पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान और ईरान से मिलती थी।
उस समय हिंगलाज तीर्थ हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ तो था।
एवं बलूचिस्तान के मुसलमान भी हिंगला देवी की पूजा करते थे।उन्हें नानी पीर कहकर सम्भोदित करते थे।
जो पाकिस्तान अलग देश बन जाने के बाद माता हिंगलाज मंदिर पाकिस्तान के क्षेत्र में आने के बाद भी माता की ख्याति कम नहीं हुई है।
और आज भी मुस्लिम वहाँ जाते हैं।
और वहाँ यात्रा करने वाले को हजियानी कह कर सम्मान देते हैं।
हिंगलाज शक्तिपीठ हिन्दुओं और मुसलमानों का संयुक्त महातीर्थ है।
हिन्दुओं के लिए यह स्थान एक शक्तिपीठ है।
और मुसलमानों के लिए यह नानी पीर का स्थान है।

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सन्तों ने किये दर्शन

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तप किया था।
उनके नाम पर आसाराम नामक स्थान आज भी यहाँ पर मौजूद है।
गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव ओर दादा मखान जैसे आध्‍यात्मिक संत भी यहाँ पर दर्शन कर चुके हैं।
लोककथाओं के अनुसार भगवान राम भी 14 वर्ष के वनवास के बाद माता हिंगलाज के दर्शन के लिए आये थे।

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